ओशो के विचार मानव चेतना, कामुकता, दांपत्य जीवन और मनोविज्ञान के अत्यंत व्यावहारिक व वैज्ञानिक दृष्टिकोण को सामने लाते हैं। उन्होंने समाज में मौजूद वर्जनाओं (Taboos) को तोड़ते हुए वैवाहिक जीवन की उन अनदेखी समस्याओं पर प्रकाश डाला, जिन्हें अक्सर अज्ञानता या संकोचवश नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
मास्टर्स और जानसन ने पहली दफा संभोग की प्रक्रिया का वैज्ञानिक अध्ययन किया है। और वे इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि पचहत्तर प्रतिशत (75%) पुरुष शीघ्रपात के शिकार हैं—पचहत्तर प्रतिशत! गहन मिलन के पहले ही वे स्खलित हो जाते हैं और क्रीड़ा समाप्त हो जाती है। और नब्बे प्रतिशत स्त्रियां कभी आर्गाज्म को नहीं उपलब्ध हांती हैं, कभी संभोग के शिखर सुख को नहीं पहुंच पाती हैं—नब्बे प्रतिशत स्त्रियां!
यही कारण है कि अक्सर स्त्रियां चिड़चिड़ी और क्रोधी होती हैं। उन्हें ऐसा होना ही है। कोई औषधि उन्हें शांत नहीं बना सकती है, कोई दर्शनशास्त्र, धर्म या नीति उन्हें अपने पुरुषों के प्रति सहृदय नहीं बना सकती। वे अतृप्त हैं। वे क्रुद्ध हैं। और आधुनिक मनोविज्ञान और तंत्र दोनों कहते हैं कि जब तक स्त्री काम— भोग में गहन तृप्ति को नहीं प्राप्त होती, वह परिवार के लिए समस्या बनी रहेगी। जिससे वह वंचित रह गई है,वह चीज उसे क्षुब्ध रखेगी और वह हमेशा झगड़ालू बनी रहेगी।
ओशो के विचार: वैवाहिक संबंधों में तनाव और स्त्री मन का असंतोष
तो अगर तुम्हारी पत्नी हमेशा लड़ती—झगड़ती रहती है तो पूरी स्थिति पर फिर से विचार करो। इसमें पत्नी का ही कसूर नहीं है, हो सकता है कि उसका कारण तुम्हीं हो। ओशो के विचार हमें इस बात के प्रति सचेत करते हैं कि जब तक हम समस्याओं की जड़ तक नहीं पहुंचेंगे, तब तक उनका समाधान संभव नहीं है।

और आर्गाज्म को न उपलब्ध होने के कारण स्त्रियां काम—विमुख हो जाती हैं, वे आसानी से काम— भोग में उतरने को नहीं राजी होतीं। उन्हें रिश्वत देनी पड़ती है, वे संभोग में जाने को राजी नहीं होतीं। और वे क्यों राजी हों यदि उन्हें इससे गहन सुख की उपलब्धि ही नहीं होती?
सच तो यह है कि स्त्रियों को लगता है कि पुरुष उनका उपयोग करते हैं, उनका शोषण करते हैं। उन्हें लगता है कि हम कोई वस्तु हैं जिसका उपयोग करके फेंक दिया जाता है। पुरुष तो संतुष्ट हो जाता है, क्योंकि वह स्खलित हो जाता है। फिर वह करवट लेकर सो जाता है। लेकिन स्त्री आंसू बहाती रहती है।
वह अनुभव उसके लिए तृप्तिदायी नहीं होता है। उसे लगता है कि मेरा उपयोग किया गया है। हो सकता है,उसके पति, प्रेमी या मित्र को उससे राहत मिली हो, लेकिन वह खुद अतृप्त रह जाती है।
आर्गाज्म की उपलब्धि और काम-समाधि का अनुभव
सौ में से नब्बे स्त्रियां तो यह भी नहीं जानती हैं कि आर्गाज्म क्या है, काम—समाधि क्या है। उन्हें कभी इसका अनुभव ही नहीं हुआ। वे कभी उस शिखर को नहीं छू पाती हैं, जहां उनके शरीर का रोआं—रोआं आर्गाज्म से कंपित हो उठे, भरपूर हो जाए। यह अनुभव उनके लिए अनजाना ही रहता है।
जब किसी संबंध में सहभागिता और संवेदनशीलता की कमी होती है, तो वह केवल एक यांत्रिक प्रक्रिया बनकर रह जाती है। शारीरिक मिलन तभी आनंददायक और रूपांतरणकारी बनता है जब उसमें भावनात्मक जुड़ाव, धैर्य और दोनों साथियों के लिए समान स्थान हो।
ओशो के विचार: वैज्ञानिक शोध और दांपत्य संबंधों का पुनर्मूल्यांकन
आधुनिक वैज्ञानिक शोधों और सेक्सोलॉजी के विकास ने भी इसी बात की पुष्टि की है कि स्त्री और पुरुष की शारीरिक व मानसिक संरचना में गहरा अंतर होता है। पुरुष का रुझान त्वरित संतुष्टि की ओर होता है, जबकि स्त्री के लिए संपूर्ण मानसिक व शारीरिक निकटता अधिक महत्वपूर्ण होती है।
यदि पुरुष केवल अपनी जैविक आवश्यकताओं की पूर्ति को ही प्राथमिकता देता है, तो स्त्री के भीतर उपेक्षा की भावना जन्म लेती है। यह उपेक्षा धीरे-धीरे उनके दैनिक जीवन में चिड़चिड़ापन, तनाव और कलह के रूप में प्रकट होने लगती है।
सुखी और संतुलित वैवाहिक जीवन के मूल नियम
- शारीरिक व मानसिक जागरुकता: जीवनसाथी की शारीरिक व भावनात्मक आवश्यकताओं को समझना अत्यंत आवश्यक है।
- संवाद और संवेदनशीलता: अपनी भावनाओं और समस्याओं के बारे में बिना किसी संकोच के एक-दूसरे से बात करें।
- समानता का भाव: स्त्री को केवल उपभोग का साधन न समझकर उसे संपूर्ण सम्मान और सहभागिता प्रदान करें।
- धैर्य और फ़ोरप्ले का महत्व: केवल शारीरिक क्रिया में जल्दबाजी करने के बजाय भावनात्मक जुड़ाव और फ़ोरप्ले को पर्याप्त समय दें।
महत्वपूर्ण बाहरी संसाधन
- मानसिक एवं भावनात्मक कल्याण तथा स्वास्थ्य संबंधी वैज्ञानिक अध्ययन के लिए राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान (NIMHANS) की आधिकारिक वेबसाइट देखें।
- ओशो के दर्शन और संपूर्ण विचारों के बारे में अधिक जानने के लिए ओशो इंटरनेशनल (Osho World) की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं।
निष्कर्ष
ओशो के विचार हमें यह गहराई से समझाते हैं कि जब तक वैवाहिक संबंधों में प्रेम, समझदारी और पूर्ण तृप्ति का भाव नहीं होता, तब तक शांति संभव नहीं है। यदि पुरुष और स्त्री एक-दूसरे की शारीरिक व मानसिक संरचना को समझकर सम्मानजनक आचरण करें, तो पारिवारिक जीवन में कड़वाहट खत्म होकर आनंद और मिठास लौट सकती है।




